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"खच्चरैहि ".....धैरि परसब.
खच्चरैहि “…..धैरि परसब.
भेल अनुभुतिविभुति सबहककिछु खटगरखच्चरैहि “…..धैरि परसब.
भेल अनुभुतिविभुति सबहककिछु खटगर किछु मीठ..
निज लेखन के निज पाठन कएनिजहि के ठोकै पीठ..
हम गामा -हम बरका गामाहोर में सब  लागल
छल बल झूठ फरेबक संगहितोर में सब  बाझल
जग भैरि के ठिक्का पट्टानिज हाथ नेने महराजा.. .
हित उपदेशक बैनि उपदेशियागाले बजबैथ बाजा
गाम छोरि सहरी बाबू बैनिकरैथ खूब तमाशा
शकुनि मोन छगुनैले जीवनभाँजैथि पापी पाशा..
अंग्रेजी हिन्दी उर्दू केपोथिये टा पढलैनि दुन्ना
मुदा मैथिली मातृभाषा मेंसबदिनुके सन सुन्ना
अनहित गप हितगर बुझि कोनाके कतेक करत विश्वासे
छल अनुराग, आशा छल बरका,सरिपहु सब निराशे
मोनक खेत बीच सबदिन देखलएक्कहि रोप कटैया
जौं सम्हरल भैरि पोख भेलैजौं नै सम्हरल  बटैया
दोख केकर के देत कोना केसब भेल एक समाने..
तरकश में नै तीर छै केकरहुहाथ में छुछ कमाने
सुगबुगाएल जौं गबदिएल मोन ,करत कोनो अनहिते
मधुरागी जौं राग अलापतमधुरहु लागत तीते
लालक लीला सगरहु पसरलनाचत संग नचावत
दू -कठीया पीटत झगरौआअपनहि घर उजारत
अप्पन बात कतय कत बाजबकतेक उघारब झाँपब
निरबुधिया संग बुईध भजारब,
हहहमरब  कि बाँचब
लिखबा क्रम में इतिहास लिखा जाएतमुदा बनत अभिसापे. ….
खचहर बैनि “खच्चरैहि “धैरि परसबसब हुनकहि परतापे……. क्रमशः… संतोष कुमार “संतोषी