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उन्नैति…. की “खच्चरैहि ”

उन्नैति…. कीखच्चरैहि
से सत्ते,,
हम सब गोटे बेसिये उन्नैतिक बाट पर छी.
पुरना रिति रेवाज, रहन सहन समाजिक सुसंस्कृति के ताक पर राखि नव नव विचार नव नव व्यवहार के संग सत्ते बेसिये उन्नैति रहल छी……
जाईत पाईत अनुसारे काज बाँटल गेल रहै कि काजक अनुसारे जाईत पाईतक बँटवारा भेल छल से कोना के कहत……
मुदा गाम समाजक बीच सबटा काज परम्परागत होईत आबि रहल..
छठियारी सँ कठियारी धैरि, सब काज में सब वर्गक लोक के भागिदारी एक दोसरा के सहयोग, सहमैति सँ सुलभ सुदृढ़ता पूर्वक होईत आबि रहल

आबक परिवेश में सबलग एकटा साधल जबाब…. अरे.. जा तोहरा बिनु की परल रहतै.
देखियहक कोना चट सब काज जाई छै
कुकूरक नांगैर में पाई बैंन्ह देबै कुदि के सब काज देतै..
(
मुल बात.. आब एक दोसरा के आवस्यकता नैआपसी मेल मिलाप, भाईचारा, सहयोग विश्वास के समापन…. )
पंडीतजी के दिनहु उकटापैंची होई छैन पंडीताईन सँ..
पंडित जी: –के कहलक अहाँके ओकरा गछबाक लेल, हम ओकरा सबहक ओहिठाम पुजा करबय जाऐब….. दैछिना बेर में प्राण सुखा लगै छै,
छोरलौं आब हम पुजा पाठ
(
की हेतै,, विनु पंडिते पुजा जेतैजमाना कतेक आगु गेल से नै जनै छियैकि बुझि परैये लोक निहोरा करय आएत.. तै भक में नै रहू…… )
नौवा (ठाकुर ):–की करबै,अपने आब सकै नै छियै धिया पुता सब परदेश पकैर लेलकैके करतै,,
धिया पुता आब ककर सुनै छैदुनू छौरा सहरे में बरका सैलून खोलने अईकनिया बच्चा सब के सेहो ओत्तै राखने अईबुझू आन्नद में …. आब सब घुरि के गाम आएत.. आकि हमरे जेका ऐहि समाज में खटतनै नैसत्त पुछी आब अपनो नै निक लगैये
(
की भेलैजमाना बदैल गेलै से नै बुझै छहक,, कियो बजबय एतह कि ककरो खुसामद छैबरका बरका सैलून खुजल छै,, ओहि में नह केश सेहो करावत लोक. ..)
कमार (बढई ):–धू: आब हमरा सबहक कोन काज छै समाज के
गेलै जमाना छोरलौं हमहूँ सब सबटालोकक बेगारी कतेक दिन करैत रहब मना करैये धिया पुता, कहैयै कोन काज छह दुआरै दुआर जेबाक,,
जमाना कते आगू गेलै तू सब अखनो गाम समाजक रटनी लगे ने रहै छह…. की करबै कहू ने
(करबै की, अहाँ अपना घर समाज अपना घरसबटा बजार में भेटिते छैविधो व्यवहार के समान रेडीमेड उपलब्ध छैभने जान छुटलै लोकक…… )
कुम्हार: –यौकीन बेसाह काल समाजे नैआन काल में समाज..
भोजगारा समान में देखियौ दहि पोरै बला बासन तक बजार किनके आनने अई समाज….
हम कथी के कुम्हार यौ,
जितुहा में खोजे नै मरलाहा में हमजाऊ जाऊ बरका टा बजार छैछोरलौं हम समाज
(
बढिये माईटिक बासन में कतौ लोक खान पीयन करय…. अरे ओर पहिलुका जमाना में किछु साधन नै छलै जे जेना करै छल
आब चमचमा करैत द्रव्य सब….
बने….)
चमार: –मरलाहा माल मवेशी अठबै काल कि ढोलहा पीटै कालऐँ यो हमरा सब ऐतबै करैत रहब. ..
अपने माल मवेसी पालबे नै करै छी हम सब जे.मरलाक बाद के उठाएतभगवान के कृपा हमहूँ सब उन्नैत केलियैसबहक धिया पुता परहै लिखै छै.. आब कि हम सब, सब दिन ओहि घुरधूँई में लागल रहब…..
(
नै नै.. अरे जखन खेती टेक्टरे होईछै, दुध दही के बजार में कोन अभाव छैपन्नी पैक फुलक्रीमअहा…….
तहन माल मवेशी लोक पालवे किया करत,
फाईदा देखियौ जे जटायु (गिद्ध )सनक निघ्रिष्ट जीव सेहो भने अलोपित गेल.. )
डोम: –गोसाउनी घर के छैठ परमेश्वरी तक के लेल सब सामग्री बजारे अबैयेआब घाटो बाट पर बजरूआ समान सब देमै लगलैडोम आब नामे टा लेल रैहि गेल……
(
बड नीक..मोनो बड बैढ गेल छलै एकरा सबहकगौवा के पते नै सब गामक गाम खरीद विक्री लै छल
पछिला साल हमरै कहलक जे अहाँ के हम पोरकै साल फलम्मा डोमक हाथे बेच देलौं.. आब ओकरे सँ फैरिछाऊ…. जौं आबो डोमे हाथक बाँसै के बनल समानक जरुरी परत कथी के उन्नैत केलौं हम सब )
क्रमशः सबगोटे एहेने मानसिकता के घेरा में अई….
सत्ते नव जमाना, नवका लोक, नीक उन्नैत सेहो…..
कदाचित्खच्चरैहि तहिया बाहर होएत,
जखन आबै बला पिढी ऐहू सँ नव जमाना के धिया पुता छाती पर चैढ के पुछतकिया केलह तू सब ऐतेक —-उन्नैतिक्रमशः
संतोष
कुमारसंतोषी