काले -भीमा*** (खच्चरैहि प्रसंग)

*** काले -भीमा*** (खच्चरैहि प्रसंग) 
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काले-भीमा .......

काले त नाम रहैक ओकर
मुदा, 
अस्सी बरखक बूढ़ सूढ़ सँ जनमासू चिलका तक आ 
दादी मईयाँ सँ नवकी कनियाँ मनियाँ तक 
सबगोटे सब ठाम ओकरा एक्कहि टा नाम सँ संबोधन करैक... भीमा भईया.... !!
ओकर भीमकाय शरीर आ बलबूता पर... भीमा भईया सन नाम सटीक सेहो बैसैत रहैक....

समयक संग, 
नहिं ओ देवी आ नहिं ओ कराह बला बात त एक नैsएक दिन सब संग लागू होईत छैक.. से भीमा भैया संग सेहो वर्तमान में लागू छैक.... !!

एकटा समय रहैक.... 
संपूर्ण ग्रामवासी के मोन में भीमा भैया प्रति एकटा अलगे छाप छपल रहैक... 
सबसँ बेसी भात (भोजन) खेनिहार... 
सबसँ बेसी काज केनिहार ....
भारी स भारी बोझा उठेनिहार... 
भूखलहु दुखलहु में काज करैत रहनिहार... 
बैसि रहल त फेर जल्दी उठल नहिं... 
उठि गेल तकरा बाद काज समाप्त करने बिनु बैसत नहिं.. 
कतहबु, केहनहु भैरिगर काज किएक नै होऊ, 
छन भैरि में उधेश पूधेश के राईख देनिहार... 
योद्धा.... 
बाहुबली.... 
नाम गुणे..... नमहर पोरगर... 
भारी भरकम, भीमकाय शरीर... 
आ 
ककरहु स कोनो भी स्थिति में नै डेराय बला लोक.... 
भीमा भईया.......!!

सदिखन, 
एकटा पुरान सन धोती... बिनु धोअल खीँचल गोल गला के गंजी आ धोती गंजी सँ मेल खाईत कान्ह पर एकटा गमछा..... 
तहिना 
शरीर हिसाबे 
असाधारण सन नमहर पएर में खीपटी सन भेल चप्पल... 
पीयर कपीस भेल बिनू धोअल दाँत, जाहि में 
तत्कालहि कएल भोजनक किछु अंश सदैव साटल...
सिलोटहि सन हाथ आ दरैर फाटल पएर में 
कतेको दिन सँ बिनू काटल कारी सियाह भेल नह... 
बिनु ककबा कएल उजरल घूमरल माथक केश आ ताहि संग मेल खाईत दाढ़ी मोंछ...... 
रोज स्नान केनिहार लोक कहियो नहाएल सोनाएल सन नहिं... 
धूरा माईट में लटाएल घोटाएल -थाल कीच सँ बहराएल सन ओकर सरूप देखि,, 
धिया पूता त चित्कार माईर उठैत छलैह...... !!

धिया पूता संग संग कनियाँ बहुरिया आ चेतनो लोक सब डेरा जाई ओकरा स... मुदा ओ कहियो ककरहु अनहित नहिं केलकैह... 
सबगोटे सबठाम ओकर मजाको उराबै... कचकचेबो करैह... खौंझेबो करैह... मुदा ओ ककरहु पलटवार नहिं करैह...

समाजिक भोज भतेर होऊ आकि कोनहु भी काज परोजन... 
सब ठाम सब काज में सबसँ आगू... 
जाबत काज संपूर्ण नै भ जाई ताबत एकहु छन बैसय कहाँ ओ... 
लोभ की.... 
आम्दनी की..... 
मोनक चाह की.... 
भैरि पेट भोजन......... ततबहि. 
से... 
बसिया भात होऊ की कँचका चूरा... 
रसगुल्ला होऊ की माछ काऊछ... 
भैरि दम हेबाक चाही.... 
हलाँकि, 
ओकरा अपनहु घर में खाई पहिरै के अभाव नहिं रहैक... 
मुदा ओ... 
जहिना समाजक काज के अप्पन बुझैत रहय 
तहिना समाजक भात के सेहो अप्पन. बुझैत रहय 
ई 
ओकर गुण रहैक आ कि अवगुण से नहिं जैनि.....

डाँर में खोंसल प्लास्टिक के बरका टा चुनौटी जौं डाँर सँ निकैलि के हाथ में ल लेलक त बुझू आधा घंटा आब ओकरा फुर्सत नहिं...

कोनहु तरहक छल कपट नै रहैक ओकरा... 
ऐहेन विशालकाय आ कठोर शरीर रैहितो हृदय बड कोमल रहैक ओकर.... 
सांसारिक भेद भाव सँ कोसो दूर.... दूएह टा बात बुझहै ओ.... 
खूब खटनाई आ खूब खेनाई...

कतेको ठाम कतेको काज परोजन में लोक सब ओकरा अपजस दै.. अपशब्द कहैक... हाथी.. राक्षस... पेटूआ... घोंचूआ... आ की सब नै कहैक... 
मुदा ओकरा लेल... धैन सन...

रौदा बसात, बरखा बून्नी, बाईढ़ पैनि -ओकरा लेल सब बराबर.. 
महींसक छोहैरि पकरने कतय स कतय रमकल आबि जाईत रहै ओ.... 
घास पातक भोझ होई की चीनी चाऊरक बोरी, एकहि छन में कतय स कतय उठा क फेकि आबै छल भीमा भैया...

मोन परैछ..... 
गामक चारू कात कोसी के पैनि भैरि गेल रहैक... ई तारा ओ तारा एक भ गेल रहैक... 
आ डीलर साहेब के मटीया तेल बंटबाक रहैन... 
मुदा, 
ट्रेक्टर पर लोड सात ड्रम मटीया तेल त गाम स तीन किलोमीटर दूर कोसी छहर पर राखल छलैह.... 
गाम कोना ऐतैह.... 
भीमा भैया..... 
भोरूका समय रहैक ...भोजन त नै... 
मुदा जलखैह.... 
डीलर साहेब सन लोक..... 
डेढ़ सेर काँच चूरा में एक सेर चीनी आ आ एक पौआ दालमूठ मिला क द देलखिन भीमा भैया के... 
जकरा ओ अपन गमछा के फाँफर बना क ओहि में में कहुना समावेश क लेलक... 
चीनी बड्ड भ गेलैह... 
एक फक्का मारैत कहलकै भीमा भैया...

त की चूड़ा और मिला देबहक... डीलर साहेब कहलखिन...

ऐँ.... हँ ध:दियौ आसेर और.... नाव खेबैत जेबैह आ फाँकैत जेबैह... बेसी दूर छैह ने... जाईत जाईत सदहा देबैह सार के..... 
साँझू पहर, 
मटीया तेल बँटा गेलै गाम में........!!

वैवाहिक बंधन में बंधलाक बादो ओकर दिनचर्या में कोनहु टा फर्क नहिं परलैह... 
ऐहि तरहेँ, 
अपन मानसिकताक संग लोकक गाईर बात, हँसी मजाक, सबटा सबकिछु झेलैत गमैत बढ़ल चैलि गेल अपन जीवन पथ पर...... 
* * * *

एक दिन भोरे भोर बरका कका के दलान पर आबि बैसि रहलैह ओ.... 
सबदिनुके सन वेशभूषा रहितो आय ओकरा में एकटा बदलाव देखा पैरि रहलै.. 
नोर सँ भीजल आँखि में ककरहु प्रति घृणा आ तामस सहजहि बुझना जा रहलै....

की भेलह भीमा भईया.... कियो किछु कहलकह की.... 
बरका कका पुछलखिन ओकरा....

जबाब सुनबाक ईच्छा हमरहु जागि उठल.. 
चुकि, 
भीमा भैया के ककरहु स कोनहु तरहक बातचीत करैत हम कहियो नै सुनने रही... आ हमरा हिसाबे त गाम समाज में कियो नै सुनने रहय.... 
जत्र तत्र लोक सब जखन ओकरा कचकचाबै, खौंझाबै त प्रत्युत्तर में --धूर बैंहि... देखबहक सरबे.... जो बैंहि... 
एतबहि बहराई ओकरा मुँहें..... 
फलस्वरूप समाज आ समाजक लोक सब ओकरा बकलेल आ मथसुन्न के संग्या सेहो देने रहैक.....

आय बरका कका संग बातचीत करैत ओकर गंभीरता,, ओकर बजबाक शैली देखि हम चकित रही.. 
कतेक आत्मीयता . .अपनत्व आ विचारक बात सब बाजि रहल ओ.... 
बकलेल आ मथसुन्न त ई समाज छैह जे कहियो ओकरा काज के सराहना नै केलकै... कहियो ओकरा समुचित स्थान नै देलकैह.... 
ओकर अद्भुत बल पराक्रम आ ओकर भोलापनक फायदा मात्र उठेनिहार ई समाज ओकरा बकलेल ढ़हलेल बनाबै में कोनहु टा कसैरि नै छोरलकै..... 
चुपचाप खटैत आ खाईत अपन जीवन के समाजक काज आबै में लगा देने रहय ओ...... 
मुदा आय बरका कका के सोझाँ आर्तनाद क रहल ओ....

हौ बरका कका बचा लएह हमरा...... हम आई तक ककरहु किछु नै हारलियैह -बिगारलियैह.... कियो दू टा पाई अपना मोने नै देलक कहियो आ नै हम ककरहु स मंगलियैह....

से त सत्ते..... 
ओ त सब दिन सबहक काज केनाई बुझैत छैह.... 
सबहक गाईर फज्जहैत आ अपजस सुननाई बुझैत छैह... 
ऐहेन गाय सन लोक ककर की हैरि लेलकै... 
के की कैहि देलकै ओकरा, जेकर चोट ऐहि तरहें लहुलुहान क देलकै ओकरा अन्तर्आत्मा के...

के की कहलकह... साफ साफ बाजह ने.... 
फेर पुछलखिन बरका कक्का.....

की कहब बरका कका ओ बारी कात में हम अपना उठै बैसय लेल कनिकबे टा एकटा घर बनेने रही. से ई बुच्चू बाबू उजाईर पुजाईर क फेक् देलक आ अपन हर बरद आनि पुरा बारी के जोईत लेलक.... कहैये हम्मर छी.....

हौ ई बुच्चू बाबू पगला त नै गेलैह.....

से हम कि जाने गेलियै बरका कका, बुझले त हेएत जे हमरा एकटा महींस पोंसियाँ देने रहै... मरै के मान रहै ओ महींस तकरा हम छह मास पालि पोसि क खुआ पीआ क भिसिण्ड बना देलियै... तकरा बाद कहलक जे महींस बेचब, पाँच हजार महींसक दाम भेलै जाहि में पाँच सय टका हमरा देह पर फेकि देलक आ महींस खोलि के ल गेल... से बात हम लोक सब के कहलियै ...तकरहि तामस छैह... आब कहैये तोहरा बाप के बहुत रास कर्जा देने छलियौह से एक एक टा पाई चुकता कर... तकरा बादे बारी में पएर राखिहन ..... 
कतेक की सब भेल ओकरा दुआरे से त सबटा जैनतहि छीयैह अहाँ ...
मोन अईछ ने
.....
ओकर छकठबा खेत जोईत नेने रहै परौनी बला सब... ओकर संपैत आ समाजक मान प्रतिष्ठा बचाबै खातिर भुखल प्यासल भैर दिन हम लाठी भैंजतहि रहलहुँ..... 
कतेको लाठी हमरा देह पर टूटल आ कतेको के हड्डी पसली हमरा हाथक लाठी स टूटलैह.... 
आब, 
हमर कोन काज छैह ककरहु.... 
हमरा स आब हेबे की करतैह लोकक.... 
अधवयसहु उमेर, दस रंगक रोग..... 
आब हमरा सँ की उपकार हेतैह ककरहु..... 
नहिं त...... 
(आखि नोरा गेलैह ओकर).. 
बरका कका अहाँक बात भैरि गाम के लोक मानैत अई... 
हमर माई बाप, घर दुआरि ,सर संपैति सबटा ओ बारीये छी जतय भैरि दिन हम खुट्टा जेना गारल रहैत छी.... 
ओहि ठाम हम जनमलहुँ ,ओहि ठाम माईक कोरा में कुदलौं फानलौं, ओहि ठाम स हमरा माई बापक लहाश उठलैह..... 
हमहूँ ओत्तहि मरबै... बरका कका हमहूँ ओत्तहि मरबै.....

कहैत उठि क विदाह भ गेल ओ.....

बैसह ने..... तू शांत भ जाह, हम बात करबै न बुच्चू बाबू स जे किया एना करैत छैह... 
तोहर काकी भोजन बनबैत हेथुन, खा क जाईहह.... (बरका कका कहलखिन)

काज राज किछु नै... ओहिना कोना खा लेब.... 
अहाँके त बुझले अई जे बिनु खटने नहिं खाईत छी हम..... 
आ समाज में, 
हमर खटनाई आब अखैर जाईत छैह लोक के.... 
काज कम आ भात बेसी भ जाईत छैह यौ बरका कका...

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बरका कका बड्ड बुझेलखिन बुच्चू बाबू के.... 
हौ बुच्चू... ई भीमा सन लोक समाजक लेल फल फूलक गाछ सन होईत छैह, जाहि में पैन दैत रहबहक त साले साल फल खाई लेल भेटतह... 
आ एकरा जैड़े स जे उखैड़ क फेक देबहक त कि खेबह... 
ओहू पगला के जीबय दहक कहुना......

मुदा बरका कका बातक कोनहु टा असैर नहिं भेलै बुच्चू बाबू पर. ..
ओ त हुनकहि स फँरबन्हीं करय लागल... 
कहय लागल ,
ई गोबराहा हमरा बारे में भैरि गाम जे बेन बँटने फिरैत अई से छोरबै नै एकरा हम..... कोट कचहरी में घसीटबै एकरा हम...
देखबै जे के की करैत अई हमर.... 
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साँझू पहर फेर बरका कका सँ भेटय एलैह भीमा भैया...... 
परिधान पुरनहि सन,, 
कनेक बदलाव रहैक... 
हाथ में एकटा मोटगरे सन लाठी आ डाँर में बान्हल गमछी में खोंसल एकटा घसकट्टा हाँसू....... 
ओकर भीजल लाल टूहटूह आँखि आ ताप सँ धधकैत ललाट देखि सहजहि बुझना पैरि रहलै जे आय कोनों अपसगुन कोनों क्लेशक बादल मंडरा रहलै ओकरा उपर... 
बुच्चू बाबू प्रति बदला के विष भैरि गेल रहैक ओकरा समुच्चा देह में... 
अन्यायी समाजक प्रति विद्रोहक भावना जागि उठलैह ओकरा अन्तरआत्मा में... 
बरका कका के किछु बाजै स पहिने बाजि उठल ओ....... ...

बरका कका हम सब लग जा क हार गुहार लगेलहुँ..
मुदा हमरा कियो नै बचेलक, कियो नै जोगेलक..... 
आब..... 
आब जौं हमरा सँ कोनो तेहेन गलती भ जाय जे अहाँके नीक नहिं लागय त, 
हमरा पर भेल अन्याय के मोन पारैत -माफ क देब हमरा.... 
बरका कका, हमरा लेल त...... 
एम्हरहु बनबासे आ ओम्हरहु बनबासे.....

(आँखिक नोर पोछि हाथक मुट्ठी के सक्कत करैत बहरा गेल ओ बरका कका के दलान पर स..) 
रोष आ आवेश में मात्र एतबहि बरबराईत जा रहल ओ.... 
एम्हरहू बनबासे.. उम्हरहु बनबासे.... 
एम्हरहु....... उम्हरहु................ 
जे सुनै 
सब कहै --बताह भ गेलै... बताह भ गेलैह..
किलकारी ....
पिहकारी..... 
थपरी.... 
बतहा......... 
पगला.............. ओह....

आ एम्हर ई एतबहि रटनी लगेने... 
हमरा लेल त, 
एम्हरहु बनबासे --उम्हरहु बनबासे....

परिवार आ समाजक लोक सब --एकरा पकैरि के मोटका डोरी सँ गछाईर के खाम्ह में बैंन्ह देलकैह..... 
दू दिन तक बान्हल रहलाक बादो ओ एतबहि कहैत रहलैह... 
हमरा लेल त, 
एम्हरहु बनबासे आ उम्हरहु बनबासे....

ओकर ऐहि बातक मतलब कियो नै बुईझ सकलैह, 
आ नै कियो बुझय के कोशिश केलकैह.........

धन्य समाज आ समाजक लोक 
जे अपन विशेष "खच्चरैहि " के वशीभूत भ एकटा भलमानुष के पूर्ण बताह बनेबा में कोनहु टा कसैर नहिं छोरलक...

समाजक हित केनिहार., भीमा भैया... 
. बुच्चू बाबू सन लोक के सेहो कोनों अनहित नहिं क सकल..... 
आ एखनहु 
पूर्ण बताह बैनि, 
समाज सँ अवहेलित होईतो, 
समाजक लेल हँसी ठहक्का के जरिया बैनि
समाज हित क रहल..... संतोषी..