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खिस्सा..... !! *दरिद्रा*

खिस्सा..... !!
*दरिद्रा*

एक बेर ,
माता पार्वती के मोन में -
एकटा ब्राह्मण के भोजन करेबाक ईच्छा भेलैन्ह.....!! 
माता पार्वती अपन मोनक बात भगवान शिव के कहलखिन्ह..

महादेव सेहो प्रसन्न होईत कहलखिन्ह जे ई त नीक बात अई... 
से हम कोनो गरीब ब्राह्मण के नोतने आबैत छी, 
ताबत अहाँ तैयारी करू...

माता पार्वती कहलखिन्ह.. दोसर किनका तकने घुरब... परमपिता ब्रम्हा जी के निमंत्रण द आबियौन ने...

महादेव मुस्काईत कहलखिन्ह जेहेन ईच्छा अहाँके... 
............

परमपिता ब्रम्हा जी... आसन ग्रहण कएलैन्हि.. 
माता पार्वती हुनका भोजन करबय लगलखिन्ह... !!

माता पार्वती जतेक भोजनक तैयारी कएने छलीह से सबटा ब्रम्हा जी खतम क देलखिन्ह... तदुपरांतो... पूर्ण भेलै -से नहिं कहथिन ब्रम्हा जी... !!
माता पार्वती कनेक सशंकित भ गेलीह जे आब की हेतैह... 
ब्राम्हण देवता भुखले नहिं उठि जाइथ.... 
माया सँ तैयार कएल भोजन त खूआ नै सकैत छलखिन ब्राह्मण देवता के... 
आब,, 
महादेव के निहोरा करय लगलीह माता....

महादेव, माता पार्वती के धैर्य बन्हाबैत कहलखिन जे ताबत किछु समय औरो ब्रह्मा जी के किछु किछु खुआबैत समय निकालू... हम किछु व्यवस्था करैत छी....!!

महादेव, 
पृथ्वी लोक पर दौरल एलाह... 
एकटा गरीब -महादरिद्र ब्राहमण देखा परलैन हुनका...!!

चट सँ ओहि ब्राह्मण के नोत आ बिझोह करा क अपना संगहि ल विदाह भेलाह....

ब्रह्मा जी के बगल में आसन लगा क ओहि भुखल दुखल ब्राम्हण के बैसा देलखिन....

नियमत:
ब्राम्हण भोज में जौं एकटा ब्राम्हण हाथ रोकि देलैन वा पूर्ण भ गेलैह-- से कैहि देलैन तकरा बाद ओहि पाँत में बैसल कियो भी ब्राम्हण कअर(हाथ) नै उठा सकैत छैथि... 
(आबक परिवेश में नै भेटत से) 
हँ, 
त ओ ब्राम्हण चटपट भोजन क लेलाह चुकि माता पार्वती खुआ रहलीह... साक्षात भगवान शिव लग में ठार छैथि... 
प्रसन्न चित्त भेल ओ गरीब ब्राह्मण चोट्टहि कहलखिन-- आब नहिं.. बस बस माता... पुर्ण भ गेलैह...!

एतेक कैहिते ......देरि ,,
ब्रम्हा जी के हाथ सेहो रूकि गेलैन्ह... 
हँ हँ... पूर्ण भ गेलैह...... !!हुनकहु कहै परलैन्ह....!!

माता पार्वती ओहि गरीब ब्राह्मण पर बड्ड प्रसन्न भेलिह... 
हे ब्राम्हण... 
अहाँ के जे इच्छा हुअय से बाजू....
अहाँ के मनोवांछित फल प्राप्त होएत.... 
हम वचन दैत छी, 
अहाँ के मोन में जे भी लालसा होएत सब पूर्ण होएत... 
से हे ब्राम्हण... मांगू.... की चाही अहाँके....

गरीब ब्राह्मण कनेक विचार केलाक बाद, 
मोनहिं मोन किछु निर्णय लैत 
बाजि उठलाह.... 
हे माता, 
जौं सत्ते अपने हमरा स प्रसन्न छी त... 
हमरा प्रत्यक्ष रूप में दरिद्रा देल जाऊ...

हे ब्राम्हण.. ई की मंगैत छी अहाँ.. 
कदाचित् अहाँक मोन भटैक गेल अई... 
मोन चित्त शांत करू... 
अहाँ त कतेको पिढ़ी दर पिढ़ी सँ महादरिद्र होईत आबि रहल छी.... 
हे ब्राम्हण अन्न धन लक्ष्मी मांगू........

हे माता अपने त वचन देने छी... से अपन वचनक मान राखैत हमरा साकार रूप में दरिद्रा देल जाऊ.....

हे ब्राह्मण... 
अहाँ नै मानब त हमरा अपन वचनक मान राखैत दरिद्रा देबै परत अहाँके.... 
दरिद्रा उपस्थित होऊ...

माताक कहिते ओ भीमकाय शरीर, कारी धूथूर, राक्षस सन रूप... दरिद्रा प्रकट भेल!

ओकर रूप देखि ओ ब्राम्हण डेरा गेलाह ....कहय लागलाह.. 
हे माता, 
दरिद्रा के एहेन वेश भुशा में हम अपना संग कोना ल जाएब.. ऐकरा देखिते हमर घर परिवार आ गाम घरक लोक सब त मुर्छिते भ जेतैह..... 
से हे माता... कृपा क के एकरा भेंड़ी बना दियौह.... जै स हम भेड़ी बनल दरिद्रा के सहजहिं ल जा सकी....

माता स्वीकार करैत कहलखिन... हे दरिद्रा अहाँ भेड़ी भ जाऊ....

भेड़ी बनल दरिद्रा के अपन गमछा सँ बैंन्ह के घीचने तीरने अपना घर पर आबि गेल ओ ब्राम्हण... 
घर पर आबिते, 
मोटका डोरी स एकटा खुट्टा में गतैन के बैन्ह देलकै दरिद्रा के.... 
आ, मोटे सन मुसदण्ड लाठी उठा क चाईर लाठी ध देलकै भेड़ी के.... .

नित्य कर्म भ गेल रहै ब्राम्हण के....जेम्हर स आबय भूखल प्यासल बान्हल ओहि भेड़ी के चाईर लाठी ध दैत रहैक....

कतेको लोक सब आबै... कतेको बात बुझाबै जे ऐहि निर्बोध भेड़ी के कोन गलती छै... जे एना कसाई बैनि गेल छीयै अहाँ.... पतिया प्रायश्चित लाइग जाएत...... 
मुदा एहि ब्राम्हण पर ककरहु बातक कोनो असर नै होई.... 
ओहि भेड़ी के अन्न जल वंचित क देने रहैक.... 
भोर दुपहर साँझ राईत.... गानल चाईर लाठी.....!!

भेड़ी बनल दरिद्रा के आर्तनाद ओकर कानबाक अवाज जहन माता लक्ष्मी के कान में पहुँचलैन्हि... 
माता लक्ष्मी आ दरिद्रा... दुनू भाई बहिन छथिन से जगजाहीर छै... 
त माता लक्ष्मी सबटा बुझिते दौरलीह माता पार्वती लग....

माता पार्वती सेहो चिंतित भ गेलीह.... कहय लगलीह... 
ब्राम्हण के विचार त बुझिये नै सकलियैह... 
सातों पुस्त स ऐहि ब्राम्हण के घर में दरिद्रा के बास छैह... 
तैं ई ब्राम्हण त दरिद्रा पर आमील पीने छैह... 
आ आब एकरा चंगूल में दरिद्रा फैंसि गेल छै... छोरतै नहिं ई ब्राम्हण..... खतम क देतैह...

आ तै सँ त श्रृष्टि में असमानता पैदा भ जेतैह... सब अमीरे भ जेतैह... गरीब कियो रहबे नै करतैह... 
ककरहु कियो सुननिहार नै रहतै... 
कोनों 
काज नै हेतैह....... ओह...

महादेव स्वयं दौरल एलाह.... 
ब्राम्हण के बुझा सुझा क.... 
हुनका घर में लक्ष्मी के वास द के.... 
दरिद्रा के मुक्त करबौलन्हिं ब्राम्हण सँ....

जाइतहु काल उठाना बला चाईर लाठी देनाई नै विसरलाह ओ ब्राम्हण.....

जखन दरिद्रा अपन रूप में आयल.... सुखा क सनटीटही भ गेल छल बेचारा.....
( हँसी ठिठोली मात्र) --संतोषी.