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बौआ रै....... कौआ.

बौआ रै.......कौआ.

बुढबा बाबा
दलान पर बैसल... 
चुपचाप... 
शांत.... 
अपन जीवनक नीक बेजाय
मोन पारैत... 
काँपैत हाथे
तमाकु रगरैत.... 
असगरूआ. भेल बैसल छलाह....

तखने.... 
कियो आगन्तुक
धरफराएल आँगन प्रवेश कएलनि.. 
... 
किछु काल बाद
सुपुत्र... 
संखु बाबु
आगन्तुक के बाहर छोरि
दलान दिस अयलनि...

बुढबा बाबा पुछि देलखिन... 
बौआ... 
के छलै.... 
चिन्हलियै नै........?

कोन काज चिन्हबाक... 
के छलै...? 
किया छलै.....? 
कोना छलै....? 
बुढ भेलह........ चुपचाप बैसबह से नै.... 
फुदकी पारैत रहैत .... 
संखु बाबु तामसक संख फुकय लगलाह...

स्तब्ध.... 
आर्तनाद करैत बुढबा बाबा.. 
संखु बाबु के 
नेनपनक बात मोन पारैत कहलैनि..

तोहरा कोरा में नेने हम आँगन में बैसल रही 
कि चार पर एकटा कौआ आबि बैसल.... 
तु......... 
आँगुरक ईशारा सँ एक सय बेर पुछलेँ.... 
बा... बू....... .. 
हम एक सय बेर हँसि के कहैत रहलियौ..... 
बौआ रै...... कौआ........

आय तोरा सँ एक बेर कोनो बात पुछबाक अधिकार नै हमरा.....

संखु बाबु निरूत्तर..... 
आँगन दिस ससैरि गेलाह.....

बुढबा बाबा पुण:
अपन जीवनक बितल दिनक हिसाब करय लगलाह......

हाथक तमाकु भीजी गेल छलैन.... 
बुढबा बाबा के अश्रु धार सँ.....

मोन राखी बात.....

बौआ रै......... कौआ.